कब मनाई जायेगी जन्माष्टमी, पूजन का शुभमहूर्त और व्रत का विधान जानें

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2 सितम्बर 2018
जन्माष्टमी सेप्सल÷【संजय पांचाल】

अधिकतर कृष्ण जन्माष्टमी दो अलग-अलग दिनों पर हो जाती है। जब-जब ऐसा होता है। तब पहले दिन वाली जन्माष्टमी स्मार्त संप्रदाय के लोगों के लिए और दूसरे दिन वाली जन्माष्टमी वैष्णव संप्रदाय के लोगों के लिए होती है।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमीः भगवान विष्णु ने पृथ्वी को पापमुक्त करने हेतु भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि रोहिणी नक्षत्र में कृष्ण रूप में अवतार लिया था। जन्माष्टमी जिसके आगमन से पहले ही उसकी तैयारियां जोर-शोर से आरंभ हो जाती हैं। पूरे भारत वर्ष में इस त्यौहार का उत्साह देखने योग्य होता है। चारों ओर का वातावरण भगवान श्रीकृष्ण के रंग में डूबा हुआ होता है। जन्माष्टमी पूर्ण आस्था एवं श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। पौराणिक धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ने पृथ्वी को पापियों से मुक्त करने हेतु कृष्ण रूप में अवतार लिया, भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को रोहिणी नक्षत्र में देवकी और वासुदेव के पुत्ररूप में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। जन्माष्टमी को स्मार्त और वैष्णव संप्रदाय के लोग अपने अनुसार अलग-अलग ढंग से मनाते हैं।

जन्माष्टमी स्मार्त संप्रदाय के लोगों के लिए और दूसरे दिन वाली जन्माष्टमी वैष्णव संप्रदाय के लोगों के लिए होती है। जो कि इस वर्ष भी 2 दिन पड़ रही है। जिसमें प्रथम दिन अर्थात 2 सितंबर को स्मार्त की होगी और 3 सितम्बर को वैष्णव संप्रदाय की मनाई जाएगी।

गृहस्थ जीवन वाले वैष्णव संप्रदाय से जन्माष्टमी का पर्व मनाते हैं। और साधु संत स्मार्त संप्रदाय के द्वारा मनाते हैं। स्मार्त अनुयायियों के लिए, हिंदू ग्रन्थ धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु में, जन्माष्टमी के दिन को निर्धारित करने के लिए स्पष्ट नियम हैं। जो वैष्णव संप्रदाय के अनुयाई नहीं हैं। उनको जन्माष्टमी के दिन का निर्णय हिंदू ग्रंथ में बताए गए नियमों के आधार पर करना चाहिए।

केवल वैष्णव संप्रदाय के लिए ही नहीं बल्कि सभी हिंदुओं के लिए श्रीकृष्ण जन्माष्टमी एक विशेष पर्व है। यही कारण है पूरी दुनिया में जहां भी हिंदू हैं। वहां यह पर्व पूरी निष्ठा और विधि-विधान से मनाया जाता है। इस साल यह त्योहार सोमवार यानी 3 सितंबर को मनाया जाएगा। जिसके लिए तैयारियां जोरों-शोरों से चल रही हैं। आइए जानते हैं जन्माष्टमी का शुभ मूहुर्त क्या है?

जन्माष्टमी का मुहूर्त:

अष्टमी तिथि प्रारंभ-रविवार, 2 सितंबर, 2018 शाम को 5 बजकर 9 मिनट से अष्टमी तिथि समाप्त-सोमवार, 3 सितंबर, 2018 को दोपहर में 3 बजकर 28 मिनट तक है।
रोहिणी नक्षत्र प्रारंभ-रविवार, 2 सितंबर, 2018 को शाम को 6 बजकर 30 मिनट से रोहिणी नक्षत्र समाप्त- सोमवार, 3 सितंबर, 2018 को शाम 5 बजकर 34 मिनट तक
यह समय वाराणसी के पञ्चाङ्ग ह्रषिकेश के अनुशार बताया गया है।

नोट,यह जन्माष्टमी का मुहूर्त 2 सितम्बर 2018 को स्मार्त संप्रदाय के लोगो के लिए है।

स्मार्त संप्रदाय==,दिनांक, रविवार,2 सितम्बर 2018 को रात्रि में पूजन का समय 10 बजकर 8 मिनट से पूजन की प्रकिया प्रारम्भ कर दो रात्रि 12 बजे या 12 बजकर 3 मिनट पर भगवान श्री कृष्ण का जन्म करो,तथा रात्रि 4 बजकर 49 मिनट तक शुभ मुहूर्त है। शुभ ग्रहों की लग्न है। आप उत्सव रात्रि 4 बजकर 49 मिनट तक भी मना सकते हो।

नोट, यह जन्माष्टमी का मुहूर्त, 3 सितम्बर 2018 का वैष्णव संप्रादाय के लोगो के लिए है।

वैष्णव संप्रदाय==, दिनांक, सोमवार, 3 सितम्बर 2018 को रात्रि में 10 बजकर 4 मिनट से पूजन की प्राक्रिया चालू कर दो रात्रि में 12 बजे भगवान श्री कृष्ण का जन्म कर दो तथा जन्म उत्सव रात्रि 4 बजकर 31 मिनट तक शुभ मुहूर्त है, आप उत्सव मना सकते हो,शुभ ग्रहों की लग्ने इस समय है।

श्रीमदभागवत को प्रमाण मानकर स्मार्त संप्रदाय के मानने वाले चंद्रोदय व्यापनी अष्टमी अर्थात रोहिणी नक्षत्र में जन्माष्टमी मनाते हैं तथा वैष्णव मानने वाले उदयकाल व्यापनी अष्टमी एवं उदयकाल रोहिणी नक्षत्र को जन्माष्टमी का त्योहार मनाते हैं।

जन्माष्टमी के विभिन्न रंग रूप– यह त्यौहार विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। कहीं रंगों की होली होती है तो कहीं फूलों और इत्र की सुगंध का उत्सव होता है तो कहीं दही हांडी फोड़ने का जोश और कहीं इस मौके पर भगवान कृष्ण के जीवन की मोहक छवियां देखने को मिलती हैं। मंदिरों को विशेष रूप से सजाया जाता है। भक्त इस अवसर पर व्रत एवं उपवास का पालन करते हैं। इस दिन मंदिरों में झांकियां सजाई जाती हैं भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है तथा कृष्ण रासलीलाओं का आयोजन होता है।

जन्माष्टमी पर्व के दिन प्रात:काल उठकर नित्य कर्मों से निवृत्त होकर पवित्र नदियों में, पोखरों में या घर पर ही स्नान इत्यादि करके जन्माष्टमी व्रत का संकल्प लिया जाता है। पंचामृत व गंगा जल से माता देवकी और भगवान श्रीकृष्ण की सोने, चांदी, तांबा, पीतल, मिट्टी की मूर्ति या चित्र पालने में स्थापित करते हैं, तथा भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति को नए वस्त्र धारण कराते हैं। बालगोपाल की प्रतिमा को पालने में बिठाते हैं तथा सोलह उपचारों से भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करते है। पूजन में देवकी, वासुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा और लक्ष्मी आदि के नामों का उच्चारण करते हैं तथा उनकी मूर्तियां भी स्थापित करके पूजन करते हैं।

जन्माष्टमी के शुभ अवसर के समय भगवान कृष्ण के दर्शनों के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु मथुरा पहुंचते हैं। मंदिरों को खास तौर पर सजाया जाता है। मथुरा के सभी मंदिरों को रंग-बिरंगी लाइटों व फूलों से सजाया जाता है। मथुरा के साथ लोग घरों को तथा अपने स्थान या जहाँ रहते जहाँ से श्री कृष्ण जन्म अष्टमी मनाते है। ये से स्थानों को भी लोग सजाते है। मथुरा में जन्माष्टमी पर आयोजित होने वाले श्रीकृष्ण जन्मोत्सव को देखने के लिए देश से ही नहीं बल्कि विदेशों से लाखों की संख्या में कृष्ण भक्त पंहुचते हैं। भगवान के विग्रह पर हल्दी, दही, घी, तेल, गुलाबजल, मक्खन, केसर, कपूर आदि चढ़ाकर लोग उसका एक दूसरे पर छिड़काव करते है। इस दिन मंदिरों में झांकियां सजाई जाती हैं तथा भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है और रासलीला का आयोजन किया जाता है।

जन्माष्टमी व्रत पूजा विधि– शास्त्रों के अनुसार इस दिन व्रत का पालन करने से भक्त को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत कामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है। श्रीकृष्ण की पूजा आराधना का यह पावन पर्व सभी को कृष्ण भक्ति से परिपूर्ण कर देता है। यह व्रत सनातन-धर्मावलंबियों के लिए अनिवार्य माना जाता है। इस दिन उपवास रखे जाते हैं तथा कृष्ण भक्ति के गीतों का श्रवण कि या जाता है। घर के पूजागृह तथा मंदिरों में श्रीकृष्ण-लीला की झांकियां सजाई जाती हैं।

आचार्य,पं. श्रीकान्त पटैरिया (ज्योतिष विशेषज्ञ)
सम्पर्क : 9131366453 / 9575289019

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