भूख से मरना देश के लिए बहुत ही शर्मसार करने वाली बात : शर्मा

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भूख से मरना देश के लिए बहुत ही शर्मसार करने वाली बात : शर्मा
फतेहाबाद , बेशक हम मौजूदा समय मे डिजिटल इंडिया की बात करते है लेकिन भारत मे लगभग पच्चीस फीसदी लोग आज भी भुखमरी के साथ जीवन यापन करने को मजबूर हैं। इसे सरकार की लापरवाही कहें या जिम्मेदारी से भागने की बात कही जाऐ भूख से मरना देश के लिए बहुत ही शर्मसार करने वाली बात है। कि
भूख अब भी दूनिया में एक बड़ी समस्या है और इसमें कोई हिझक नहीं कि भारत में दशा बदतर है। हम चाहे तरक्की और विज्ञान की कितनी भी बात कर लें लेकिन देश के भूखमरी के आंकड़े हमें चौकाते है। आज भारत की आबादी का लगभग 5वां हिस्सा कहीं न कहीं हर दिन भूखा सोने को मजबूर है ये बात नेशनल ह्यूमन राइट्स कॉउंसिल के महासचिव डॉ राजेश शर्मा नें विश्व खाद्य दिवस पर प्रैस वार्ता के दौरान कही कि भारत में समाज कल्याण से जुड़ी
योजनाओं जिनमें खाद्य सुरक्षा की योजनाएं भी शामिल हैं, के सामने सबसे बड़ी चुनौती लक्षित समूहों की पहचान करने और उन तक पहुंचने की रही है।हालांकि बीते तीन सालों के दौरान सरकार ने कई बार दोहराया है कि वह आधार जैसे सरकारी दस्तावेजों से इन योजनाओं को जोड़कर इन दिक्कतों को दूर करने की कोशिश कर रही है।
लेकिन ग्लोबल हंगर इंडेक्स में लगातार कमजोर प्रदर्शन देखते हुए अब सरकार को अपने प्रयासों में हो रही चूक का विश्लेषण करने की जरूरत है। इस रिपोर्ट में स्वच्छ भारत मिशन के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश छिपा है।संदेश यह कि मिशन लागू करते हुए इस बात का भी ध्यान रखा जाए कि स्वच्छता और पोषण का सीधा संबंध है। उदाहरण के लिए दूषित पानी पीने से डायरिया जैसे रोग फैलते है। और इनके चलते पांच साल से कम उम्र के बच्चों में कुपोषण होने की संभावना बढ़ जाती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार ग्लोबल हंगर इंडेक्स रिपोर्ट के नतीजों पर ध्यान देगी और उनके मुताबिक अपने कल्याणकारी कार्यक्रमों में बदलाव करेगी शर्मा ने कहा कि गरीबी से मुक्ति अभियान को सफल बनाने के लिए सरकार विशेष निगरानी की व्यवस्था करेगी। इस अभियान में आम जनता की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए जन जागृति भी जरूरी है, अन्यथा और अभियानों की तरह यह अभियान भी भ्रष्टाचार और लालफीताशाही का शिकार हो सकता है। आज भारत विश्व भुखमरी सूचकांक में बेहद लज्जाजनक सोपान पर खड़ा है तो इसके पीछे भ्रष्टाचार, योजनाओं के क्रियान्वयन में खामियां और गरीबों के प्रति राज्यतंत्र की संवेदनहीनता जैसे कारण ही प्रमुख है। गरीबी भूख और कुपोषण से लड़ाई तब तक नहीं जीती जा सकती है, जब तक कि इसके अभियान की निरंतर निगरानी नहीं की जाएगी।भारत को यह सोच अपनाने की जरूरत है कि अगले दशक में दीर्घकालिक राजनीतिक प्रतिबद्धता के साथ फूड कूपन, नकद राशि और इसी तरह के हस्तांतरण के उपायों से भूख के खिलाफ लड़ाई लडऩी होगी। ऐसे बदलाव वाले कदमों को अमल में लाए बिना भारत भूख से निजात नहीं पा सकेगा।

रिपोर्ट: शिव दिनेश शर्मा

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