वादा तेरा वादा चुनावी तेरा वादा , वादे पे तेरे मारा गया- सुरेंद्र पटेरिया

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देश की विडंबना या अभिशाप जनता की आवाज में शामिल कलम से वेदना व्यक्त करते हुए देश के नाम समर्पित करती है l

चुनावी सरगर्मी बढ़ते ही सियासत की लालसा में भले ही राजनीतिक पार्टियां जनता के बीच झूठे वादों का ढिंढोरा पीटने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है l

अगर सच्चाई पर नजर डाली जाए तो अंधकार ही अंधकार दिखाई देता नजर आ रहा है
रियासत और सत्ता का खेल तो सदियों से चला आ रहा है पर उस समय ईमानदारी निष्ठा की निष्पक्ष तस्वीर होती थी l
प्रज्ञा तथा राज्य के लिए लोग कुर्बानी देने में भी पीछे नहीं हटते थे
पर आज कुछ विपरीत परिस्थितियों से देश का लोकतंत्र जूझ रहा है
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आईने में स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि आजादी के बाद से जब लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू हुई थी तब से आज तक कई राजनीतिक पार्टियों दलों का उदय हुआ और बारी-बारी से सत्ता में आई इनकी जीत हुई हार हुई किंतु देश की जनता को सिर्फ हारना ही पड़ा है l
ना जाने कब जीत होगी भी या नहीं वर्तमान हालात मन को झकझोर देता है जब देश वाद को छोड़ कर परिवारवाद का दर्शन नेताओं के बगावती सुर देखने को सामने मिलते हैं तब स्पष्ट हो जाता है कि सिर्फ निजी स्वार्थ निहित और कुछ भी नहीं क्या करें समय की नजाकत को समझते हुए दुनिया में आए हैं तो जीना ही पड़ेगा जीवन है इस समय यह हालत मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले की विधानसभाओं में आसानी से देखा जा रहा है मध्य प्रदेश के बज रहे चुनावी बिगुल में शामिल उम्मीदवारों से उम्मीद हासिल करने कामयाब रहेगी या झूठा तेरा वादा ही रह जाएगा जो आने वाले वक्त का इंतजार है ll

सुरेंद्र पटेरिया छतरपुर जिला ब्यूरो

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