डायबीटिज से नहीं इसके ज़बर्दस्ती के प्रचार से डरिए!

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डायबीटिज से नहीं इसके ज़बर्दस्ती के प्रचार से डरिए!

पिछले कई महीनों से कार में सफर करते ही कंपकंपी लगने लगती है । रोज़ एफएम रेडियो पर एक एड आता है और कई बार आता है कि क्या आप ज्यादा पानी पीते हैं तो हो सकता है कि आपको डायबीटिज हो.. क्या आप ज्यादा खाना तो नहीं खाने लगे हैं .. कहीं आपको डायबीटीज तो नहीं… क्या आपको बार बार बाथरुम जाना पड़ रहा है .. कहीं आपको डायबीटिज तो नहीं हो गई है। कुछ भी आप कर रहे हों तो हो सकता है कि आपको डायबीटीज़ हो… ये एक निजी डायबीटीज़ क्लीनिक के चेन का का एड है।

 

पिछले कुछ सालों से ये आंकड़े (जाने किस रिसर्च और सर्वे का ये आकंड़ा है पता नहीं) दिये जा रहे हैं कि दुनिया में सबसे ज्यादा डायबीटीज़ के मरीज़ भारत में है। शुगर का लेवल बढ़ा नहीं कि आपको डायबीटीज का मरीज करार दिया जाने लगा है । इस बहाने देश में डायबीटीज़ से जुड़ी दवाओं की कंपनियाँ रोज़ डरा डरा कर हमसे पैसे लूट ले जा रही हैं। याद रखिए शुगर के लेवल का बढ़ना एक अस्थाई समस्या हो सकती है । ये आपके शरीर के मेटाबॉलिज़्म पर भी निर्भर करता है । इसका डायबीटीज़ से कोई लेना देना नहीं है…

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डायबीटीज़ तभी होता है जब आपकी #पैंक्रीयाज़ की ग्रंथी काम करना बंद कर देती है और शुगर को उर्जा में बदलने की क्षमता आपके शरीर में नहीं रहती है। लेकिन ये प्रोपेगैंडा पिछले दस सालों में अंतराष्ट्रीय और अमेरीकी कंपनियों के साथ डायबीटीज संस्थानों की साजिश का हिस्सा है। ताकि भारत की बडी आबादी को डायबीटीज़ का मरीज़ करार दिया जाए और जमकर पैसा लूटा जाए। इस साजिश से हो सके तो बचिये… शुगर लेवल के बढ़ने या कम होने से खुद को डायबीटीज़ का मरीज मत मान लीजिए। इन निजी कंपनियों के झांसे में मत आइये।
पुराने आंकड़े बताते हैं कि डायबीटीज के लिए शुगर लेवल फास्टिंग के वक्त 140 और खाना खाने के बाद 170 माना जाता था जब कि आज के वक्त इसे अंतराष्ट्रीय डायेबीटीज से जुड़े अमेरिकी संस्थानों ने फास्टिंग के वक्त इसे घटा कर 90 और खाना खाने के बाद 130 कर दिया। ये क्यों किया गया इसको लेकर कोई सही रिसर्च नहीं है। सो बेवजह दवाएं खाने से बचिये।

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अपनी लाइफ स्टाइल को दुरुस्त कीजिए। शारीरिक श्रम और एक्सरसाइज के लिए समय सुनिश्चित करें। जंक फूड की जगह हेल्दी डाइट को शामिल करें। नींद भरपूर लें, और जिंदगी को पूरे मजे से जिएं। टेंशन को भेज दें दवा कंपनियों के पास। और वैसे भी लाइफ़स्टाइल बीमारियों के लिए मैनेजमेंट ही उपचार है।

रिपोर्ट :- कौशलेश कुमार

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