साहित्य सृजन मंच बिसवां द्वारा संदीप सरस के संयोजन में ‘महाकवि नीरज स्मृति संध्या’ का आयोजन सुकवि

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रिपोर्ट आर.एस.पाल चन्द्र शेखर प्रजापति

बिसवां(सीतापुर)

【 *महाकवि गोपालदास नीरज स्मृति काव्य-संध्या*】

  • साहित्य सृजन मंच बिसवां द्वारा संदीप सरस के संयोजन में ‘महाकवि नीरज स्मृति संध्या’ का आयोजन सुकवि रामकुमार सुरत के आवास पर एस जे डी कॉलेज के संस्कृत प्रवक्ता वृंदारक नाथ मित्र की अध्यक्षता में किया गया।जिसका संचालन कवि आनंद खत्री ने किया।

महाकवि नीरज जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केंद्रित विमर्श को समर्पित संध्या में डॉ शैलेष गुप्त ‘वीर’,संदीप सरस,रामकुमार सुरत,आनंद खत्री, नैमिष सिंह, रामदास गुप्त, आलोक यादव, अजय सिंह अनुराग आदि कवियों ने अपनी रचनाओं से नीरज जी को श्रद्धांजलि दी।

मुख्य अतिथि डॉ शैलेष गुप्त वीर ने सन 2012 में महाकवि नीरज जी से स्वयं द्वारा लिए गए साक्षात्कार के कुछ अंश साझा किए।उनके एक सवाल के जवाब में नीरज ने कहा था कविता सदैव जीवित रहेगी जब तक मनुष्य के जीवन में सुख-दुख की पीड़ा है,तब तक कविता सुरक्षित है। कविता तो एक साधना है इसे व्यवसाय बनाना अपराध है। साहित्य में भी समय अच्छे बुरे लेखन को सूप की भांति छांटकर रख देता है।यह जरूरी नहीं है कि जो आप लिख दे या जो छप जाए वह कविता ही है।नीरज जी ने आगे कहा कि मेरे जीवन की लिखी गई सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में चार रचनाएं हैं जो मैंने मां को समर्पित करके लिखी हैं।

अध्यक्षीय उद्बोधन में वृंदारक नाथ मिश्र जी ने कहा कि नीरज जी का जाना साहित्य के एक युग का अवसान है। गीत के अश्रु नहीं रुक रहे हैं और ग़ज़ल गमगीन है। हमने अमीर खुसरो ग़ालिब कबीर तुलसी को नहीं देखा लेकिन हमें हम सौभाग्यशाली हैं हमें गर्व है कि हम नीरज युग में पैदा हुए।

शैलेष वीरजी ने अपने एक दोहे से नीरज जी की गंगा जमुनी तहजीब से जुड़ी रचना धर्मिता को प्रणाम किया-
कौन बाँटता है तुम्हें,यह नफरत का ज्ञान।
ढाई आखर में बसे,गीता और कुरान।

साहित्यकार संदीप सरस ने कहा कि नीरज जी जैसे कलमकार सदियों में कभी कभार ही पैदा होते हैं नीरज जी ने निश्चित रूप से चार पीढ़ियों को अपने साहित्य से प्रेरित किया है।सरस ने अपने गीत की कुछ पंक्तियों से उन्हें श्रद्धांजलि दी-

सपने तो सपने होते हैं लाखों हो चाहे इकलौता,
जो सपना सच हो न सके तो सपने का मर जाना अच्छा बूंद बूंद से तृप्ति मिली तो प्यास बहुत शर्मिंदा होगी, फिर प्यासे का पनघट तट से प्यासे ही घरआना अच्छा।

सुकवि आनंद खत्री ने तो नीरज जी के तमाम गीत उन्हीं के अंदाज में गाकर श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया। अपने एके छंद से उन्होंने नीरज जी को नमन किया-

दिल देनाही है उस ईश को दो,सदा ध्यान उसी में रमाया करो।
सत्कर्मो मेंजो है समाया हुआ,नितशीष उसीको झुकाया करो।
इन भौतिकता में नहीं उलझो,नही मोह में चित्त फंसाया करो।
यह आनन्द देह पतंगा बना,प्रभु,ज्योति में ही जल जाया करो।।

कार्यक्रम आयोजक रामकुमार सुरत जी ने नीरज जी की बेबाक बयानी को अपनी रचनाधर्मिता का हिस्सा बनाते हुए एक मुक्तक से उन्हें नमन किया-

उमर अब हो गयी पचपन न जाने कब बड़े होगे।
तेरी बातों मे हल्कापन न जाने कब बड़े होगे।
फरिश्ता मान के हमने तुम्हे हर हाल मे पूजा,
दिखा तुममे न अपनापन, न जाने कब बड़े होगे।।

मुक्तकों के बेजोड़ शिल्पकार अजय सिंह अनुराग ने एक बेहतरीन मुक्तक से नीरज जी को स्मरण किया- पीना है तो तुम कलियों की ओस पियो।
अपने ही आंसू भी हो मदहोश जिओ।
तृष्णा तो केवल दुखों की जननी है,
जितना है उतने में कर संतोष जिओ।

युवा कवि नैमिष सिंह ने नीरज जी के एक अमर मंत्र दोहे को साझा करते हुए उन्हें नमन किया-

आत्मा के सौंदर्य का शब्द रूप है काव्य।
मानव होना भाग्य है कवि होना सौभाग्य।

नीरज स्मृति संध्या के अंतिम चरण में सभी उपस्थित कवि, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों ने नीरज
की अमर रचना कारवां गुजर गया सामूहिक रूप से गुनगुना कर उन्हें अपनी भावांजलि अर्पित की।

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