हरियाणा पंजाबी स्वाभिमान संघ ने किया शहीद मदन लाल ढींगरा को याद

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18 अगस्त 2018
रोहतक÷【संजय पांचाल】

रोहतक। हरियाणा पंजाबी स्वाभिमान संघ ने जोर शोर से शहीद मदन लाल ढींगरा का शहीदी दिवस मनाया। स्थानीय रोहतक शहर के मातूराम कम्युनिटी सेन्टर में स्थित शहीद की मूर्ति पर माल्यार्पण करके एवं फूलों से सुसज्जित करके शहरवासियों ने इस महान शहीद को श्रद्धांजलि दी।

शहीद मदन लाल ढींगरा जी के पूर्वज पंजाब की सीमा में सरगोधा स्थित गांव साहिवाल के मूल निवासी थे जो 1950 में गांव छोडकर सिक्ख गुरूओं की नगरी अमृतसर में बस गये। धींगडा जी का जन्म अमृतसर के खत्री परिवार में 8 फरवरी,1883 को अमृतसर में डाक्टर रायसाहब दितामल धींगडा के घर हुआ। इनकी माता मन्तो देवी धार्मिक संस्कारों वाली महिला थी। इनका परिवार पंजाब के समृद्ध परिवारों में शुमार था, पिता हिसार से सिविल सर्जन के पद से सेवानिवृत होने के बाद अमृतसर में निवास करने लग गये।

जब ढींगरा जी लाहौर में एमए की पढ़ाई कर रहे थे तो भेदभाव के कारण विश्वश्विद्यालय के प्रिंसिपल के विरोध के कारण धींगडा जी को वहां निकाल दिया गया था। उन्होंने इंग्लैंड के कपड़े से बने ब्लेजर का विरोध किया और स्वदेशी अपनाने के लिए सभी को आग्रह किया। केवल 21 साल की आयु में ही ये सभी छात्रों का नेतृत्व कर रहे थे।

मदन लाल ढींगरा जी के परिवार में 6 भाई और 1 बहन थे। सभी 6 भाइयों ने विदेश में पढ़ाई की। इनके पिता जो अमृतसर में मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) थे और बहुत पैसे वाले थे। ये हमेशा मदन लाल ढींगरा जी से नाराज रहते थे क्योंकि उन्हे हमेशा देशभक्ति का भूत सवार रहता था। वो हमेशा देश आजाद कैसे होगा, सिर्फ देशभक्ति की गतिविधियों में ही लगे रहते थे।

लन्दन में भारतीय सेना का एक अवकाश प्राप्त अधिकारी कर्नल विलियम वायली रहता था। वह भारतीय छात्रों की जासूसी करता था। उसने मदनलाल के पिता को सलाह दी थी कि वे अपने पुत्र को इंडिया हाउस से दूर रहने की सलाह दे। इससे मदनलाल उससे ओर भी घृणा करने लगा। क्रान्तिकारियों ने अंग्रेजो के जासूस वायली की हत्या करने का निश्चय किया और यह काम मदनलाल ढींगरा को सौंपा गया।

भरी सभा में ढींगरा जी ने 1 जुलाई 1909 इम्पीरियल इंस्टिच्यूट के जहांगीर हाल मे रात्री भोज करके बाहर आ रहे कर्जन वायली पर नजदीक से 5 फायर किए। जिसमें से 4 गोली कर्जन को लगी। फिर 1 पारसी डॉक्टर ने बीच मे आकर कर्जन को बचाने की कोशिश की तो ढींगरा जी ने 2 फायर डॉक्टर के ऊपर कर दिए। जिससे दोनों की मौके पर ही मौत हो गई। ढींगरा जी जिंदा पुलिस के हाथ नही आना चाहते थे जिससे उन्होंने खुद पर गोली चलाने की कोशिश की लेकिन वे सफल न हो सके।

कोर्ट में पूछने पर ढींगरा जी ने साफ कह दिया था कि मुझे अपना कोई बचाव नही करना है। केवल डेढ मास में आनन फानन मे कोर्ट ने सजाये मौत का फैसला दे दिया, तब धींगडा ने कहा कि मुझे गर्व है कि मैं अपने देश के लिए फांसी पर झूलने जा रहा हूँ और फिर 17 अगस्त 1909 को प्रात: ढींगरा जी को फांसी दे दी गई। उस समय महात्मा गांधी ने ढींगरा जी के कर्जन वायली की हत्या करने और धींगडा के कार्यों की निंदा की थी। ढींगरा नें आखिरी समय में भगवान से यही प्रार्थना की थी कि मैं दोबारा इसी भारत देश की धरती पर जन्म लूं और मौका मिले तो दोबारा अपने देश के लिए जान दूँ।

इस अवसर पर हेमंत बख्शी जी ने कहा कि आज इस शहीद को हरियाणा में सभी जगह चल रही इकाइयों ने श्रद्धांजलि दी है और वतन पर मिटने वाले शहीदों के सम्मान के लिए वे हमेशा ततपर रहेंगे। इस अवसर पर गुलशन उप्पल ,एम एल अरोड़ा, महेंद्र बतरा, सीता राम चुघ ,दीपू नागपाल,हन्नी भ्याना,संजीव कपिल शर्मा, पंकज वधवा, रमन मुंजाल,संजीव ढल, एवम संघ की समस्त कार्यकारिणी मौजूद थी।

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