माँ रचनाकार देवेंद्र कश्यप ‘ निडर’

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  • ” मॉ ”
    मॉ दुनिया का सार है
    जो स्रष्टि का आधार है ।
    मॉ दयावान औ ‘निडर’ है
    मॉ ही अनाथ की शरण है ।
    मॉ मन की मुदित भावना है
    औ सफलता की साधना है
    वह संवेदना की शान है
    अमर वेदनाओं की आन है
    सहिष्णुता की प्रतिमूर्ति है
    फैला रही यशकीर्ति है
    मॉ ही साक्षात् भगवान है
    कालजयी और महान है
    मॉ ताल सरिता समुन्दर है
    मॉ पर्वत पठार गुल सुन्दर है
    मॉ ही मन्दिर और मस्जिद है
    मॉ ही काबा और काशी है
    मॉ ही बुद्ध विहार है
    सारे धर्मों का आधार है
    मॉ तो जीवन का आगाज है
    जिन्दग़ी के मुअम्में का राज है ।
    मॉ तो स्याही और तेज कलम है
    तड़ाग मध्य खिला कमल है ।
    मॉ बच्चों की बुनियाद है
    जो पूरी करती फरियाद है ।
    जहां में कुछ भी नहीं है
    जो मॉ में समाया नहीं है
    करें सम्मान नहीं जो मॉ का
    वह अशिष्ट है
    स्वार्थ से लिपटा हुआ वह
    नर अनिष्ट है ।
    —-देवेन्द्र कश्यप ‘निडर’
  • सामाजिक चिंतन,, शिक्षाविद्
    सीतापुर-उत्तर प्रदेश

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