बिनु सत्संग विवेक न् होई, राम कृपा बिनु सुलभ न् सोई”

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फोटो परिचय- निरंकारी सत्संग मे गुरु अमृत वचन प्रदान करते महात्मा उत्तम प्रकाश एवं उपस्थित महापुरुष।

“बिनु सत्संग विवेक न् होई, राम कृपा बिनु सुलभ न् सोई”
👉 शहर की नई बस्ती में निरंकारी सत्संग का आयोजन

ललितपुर।
संत निरंकारी शाखा मण्डल ललितपुर द्वारा निरंकारी सत्संग का आयोजन शहर के सरस्वती ज्ञान मंदिर बालिका इण्टर कॉलेज नई बस्ती में ब्रम्हज्ञानी महात्मा उत्तम प्रकाश निरंकारी के सानिध्य में किया गया। महात्मा उत्तम प्रकाश निरंकारी ने सतगुरु अमृत वचन प्रदान करते हुए कहा कि सत्संग ही एक ऐसा सरोवर है, जो आनन्द देने वाला है। इसमें डूबें रहें तो इसकी शीतलता हमेशा प्राप्त होती है। कहा कि “बिनु सत्संग विवेक न् होई, राम कृपा बिनु सुलभ न् सोई” अर्थात भक्त हमेशा यही कामना करता है कि सन्तों से ही हमारा सम्पर्क बढ़े, महापुरुषों से ही हमारा नाता जुड़े और गुरुमुखों से मिलाप हो। साधु संगत के प्रताप से ही जीवन में परिवर्तन आता है।
महात्मा उत्तम प्रकाश ने कहा कि कहा कि जिस तरह से चन्दन के पास उगी हुई बनस्पति में भी चन्दन की खुशबू आ जाती है, उसी तरह से एक लोहा है, वह पारस को छू जाता है, और फिर वह कंचन बन जाता है, इसी तरह से संतों की अवस्था को कबीर जी राम का रूप ही हो गए हैं। कहा कि जब तक हमें साधु-संगति नहीं मिलती, तब तक हमारे जीवन में महानता आने वाली नहीं है, हमारा जीवन ऊचाइयों की तरफ बढ़ने वाला नहीं। अगर हम मनसुख की संगति करते रहे, खुदगर्जियो को अपने मन में बसाते रहे, तो हम कभी भी चैन प्राप्त नहीं कर सकते। हम सांस लेते हैं, हवा के कारण हमारा जीवन चल रहा है, लेकिन उसी हवा में जब जहर मिल जाये तो कितना बड़ा नुकसान होता है। इसी तरह कुसंग का माया का प्रभाव भी हमारे मन को जहरीला बना देता है।
उन्होंने कहा कि हमने इन्सानो की गोद में जन्म लिया है तो इंसान से प्यार करना होगा। अगर इंसानों से प्यार कर लिया, तो इस हरि से प्यार कर लिया। ऐसा समर्पित प्रेम-भाव उनके हृदय में ही पैदा होता है, जिन्हें गुरु-कृपा से आत्म-ज्ञान हो जाता है।
महात्मा उत्तम प्रकाश ने कहा कि गुरुमुख महापुरुष ने हमेशा इस प्रेम-भावना को अपना कर रखा है। जब इस निराकार-दातार का ज्ञान प्राप्त हो जाता हैं, इस मालिक के साथ नाता जुड़ जाता है, इस मालिक को जान लेते हैं तो हम जान जाते हैं कि तन भी इसका है, मन भी इसका है, धन भी इसका है, लेकिन जिसको मालिक की पहिचान नही होती है, वह अपने आप को मालिक मान बैठता है। भक्तों हमेशा इस असली मालिक को माना है, और इसी को समर्पित होकर यह जीवन व्यतीत किया है। यह शिक्षा उन्हीं संतो महापुरुषों को प्राप्त हुई जिन्होंने इसको अपने जीवन का अंग बना लिया और सहज में ही इस जीवन को व्यतीत करते हुए एक इंसान कब ऊपर उपकार करते हुए यस प्राप्त किया। इस प्रकार के ज्ञान पर आधारित प्रेम करने वाले भक्त विरले ही होते हैं।

निरंकारी सत्संग में मुखी महात्मा अमान साहू, गुलाब, महेश निरंकारी, नीलम, सरला, सुप्रिया, दीपक कुमार, मानसिंह मीडिया प्रभारी, दयाराम, प्रतिभा, शांति देवी आदि महापुरुषों का सराहनीय योगदान रहा।

रिपोर्ट-  मानसिंह, ललितपुर।

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