कौन थे सर छोटूराम, जिनकी प्रतिमा का आज पीएम मोदी करेंगे अनावरण

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9 अक्टूबर 2018
रोहतक÷【संजय पांचाल】

किसानों के अधिकारों के जबरदस्त हिमायती सर छोटूराम अपनी सैलरी का बड़ा हिस्सा एक स्कूल को दान कर दिया करते थे.

हाल ही में अपने एक भाषण में हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने सर छोटूराम को भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा बताया था. अब मंगलवार को, हरियाणा में प्रधानमंत्री सर छोटूराम की 64 फीट की प्रतिमा का अनावरण करने वाले हैं. सर छोटूराम को हरियाणा के बाहर भले ही ज्यादा लोग नहीं जानते लेकिन हरियाणा के किसानों के बीच सर छोटूराम एक जाना-पहचाना नाम है. पीएम मोदी सर छोटूराम की प्रतिमा के अनावरण के बाद उस म्यूजियम भी जाएंगे, जहां सर छोटूराम से जुड़ी कई चीजें संरक्षित की गई हैं. इस म्यूजियम में उनके जीवन को फिर से उकेरने का प्रयास भी किया गया है.

इस दौरान सर छोटूराम के पड़पोते और केंद्रीय स्टील मिनिस्टर चौधरी बीरेंद्र सिंह, हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और हरियाणा के दूसरे नेता भी पीएम के साथ होंगे.

कौन थे सर छोटूराम?

सर छोटूराम हरियाणा के रोहतक जिले के गढ़ी सांपला गांव के रहने वाले थे. ब्रिटिशों के शासनकाल में उन्होंने किसानों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी. सर छोटूराम को नैतिक साहस की मिसाल माना जाता है.

ब्रिटिश राज में किसान उन्हें अपना मसीहा मानते थे. वे पंजाब राज्य के एक बहुत आदरणीय मंत्री थे, उन्होंने वहां के विकासमंत्री के तौर पर भी काम किया था. यह पद उन्हें 1937 के प्रोवेंशियल असेंबली चुनावों के बाद मिला था.

1930 में उन्हें दो महत्वपूर्ण कानून पास कराने का श्रेय दिया जाता है. इन कानूनों के चलते किसानों को साहूकारों के शोषण से मुक्ति मिली. ये कानून थे पंजाब रिलीफ इंडेब्टनेस, 1934 और द पंजाब डेब्टर्स प्रोटेक्शन एक्ट, 1936. इन कानूनों में कर्ज का निपटारा किए जाने, उसके ब्याज और किसानों के मूलभूत अधिकारों से जुड़े हुए प्रावधान थे.

सर छोटूराम के नैतिक बल को आज भी याद करते हैं लोग
सर छोटूराम को नैतिक रूप से बहुत ताकतवर माना जाता है. वह भाई-भतीजावाद के सख्त खिलाफ थे. उन्हें ‘राव बहादुर’ की उपाधि भी दी गई थी. उन्हें लोग ‘दीनबंधु’ भी कहा करते थे.

सर छोटूराम का नैतिक बल कैसा था, इसका उदाहरण उनकी पत्नी बताती हैं. इंडियन सिविल सर्वेंट एसके कृपलानी अपने बेटे की सिफारिश लेकर उनके पास पहुंचे. उन्होंने अपने बेटे को नौकरी में प्रमोशन देने की बात सर छोटूराम से कही. इस पर छोटूराम का जवाब था, “मैंने अपने कामों का एक पैमाना बना रखा है कि कभी किसी रिश्तेदार, करीबी या दूर के किसी जानने वाले की सरकारी या प्राइवेट नौकरी पाने में कोई मदद नहीं करूंगा. अगर कोई भाई-भतीजावाद में मेरे खिलाफ उंगली उठाता है तो मेरे पास पॉलिटिक्स छोड़ देने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं है.”

सर छोटूराम बहुत ही साधारण जीवन जीते थे. और वे अपनी सैलरी का एक बड़ा हिस्सा रोहतक के एक स्कूल को दान कर दिया करते थे.

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